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मौसी और अकटारा को चोदा – देसी कहानी

शहर में जिस्म की आग बुझाई

शहर में जिस्म की आग बुझाई- 1


मेरा नाम मुस्कान है और ये मेरी जिस्म की आग की पहली कहानी है. मैं अन्तर्वसना की नियमित पाठक हूँ. हमेशा ही मैंने सोचा कि अपनी कहानी भी आप लोगों के साथ साझा करूँ मगर व्यस्तता के कारण नहीं कर पाती थी।
मगर अब कोशिश करुँगी कि मैं भी अपनी हर कहानी आप तक पंहुचा सकूं।

दोस्तो, मैं अपने बारे में पहले बता दूँ:

मैं 30 साल की शादीशुदा महिला हूँ, मेरा फिगर 36-32-36 है और मेरी लम्बाई 5 फीट 7 इंच है। मैंने पढ़ाई में बी कॉम किया है।
मेरी शादी को 10 साल हो चुके हैं और मेरे घर में मैं मेरे पति और एक 6 साल की एक बेटी है। मेरे पति एक प्राइवेट संस्था में कार्य करते है।
दिखने में मैं काफी खूबसूरत हूँ मगर मेरे पति दिखने में उतने सुन्दर नहीं। मेरे पैर में बचपन से ही दिक्कत थी जिससे मैं थोड़ा लगड़ा कर चलती हूँ। इसके ही कारण घर वालों ने मेरी शादी जल्दी और सामान्य परिवार में कर दी।

दोस्तो, मेरे पति शादी के समय तो काफी सेक्स करते थे मगर उनका लंड उतना बड़ा नहीं है कि मुझे सन्तुष्ट कर सकें।
और अब तो कभी कभार ही सेक्स होता है।

मगर कहते हैं न कि भूखे को खाना कहीं से भी मिले ... वो वहीं चला जाता है।
ठीक वैसे ही मेरे साथ भी हुआ ... जिस्म की आग मुझे दूसरे मर्दों के बिस्तर तक ले गई।
मगर ये बात आज तक किसी को नहीं पता चलने दी।

दूसरे मर्दों के साथ सोना अब मेरे जिस्म की मजबूरी बन गई है; पति से सुख नहीं पा कर मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं था।

दोस्तो, आज की यह कहानी तब की है जब मैं पहली बार किसी दूसरे मर्द से चुदी थी।

यह बात शुरू होती है मेरी शादी के दो साल बाद तब हम नए नए गांव से शहर में आये थे। पति की एक कंपनी में नई नई नौकरी लगी थी तो वो मुझे लेकर शहर आ गए. अब यहाँ मैं और पति ही रहते थे। कंपनी की तरफ से एक अच्छा सा कमरा मिला था।

अब यहाँ आकर मुझे कुछ आजादी सी मिल गई थी। दिन भर पति काम में होते और मैं घर पर अकेली। बस दिन ऐसे ही कट रहे थे।

फिर एक दिन मेरी जिंदगी ने करवट ली।
मेरे पति ने शाम को घर आकर बताया कि कल मेरे कंपनी के मैनेजर घर आ रहे हैं खाना खाने, कुछ अच्छा सा बना लेना।

अगले दिन मैं सुबह से ही शाम के खाने की तैयारी में लग गई. घर की अच्छे से साफ़ सफाई भी की और खाने की पूरी तैयारी कर ली.

शाम को 5 बजे पति घर आ गए और मेरा काम देख काफी खुश हुए। वे अपने साथ एक शराब की बोतल भी लाये थे तो मैं समझ गई कि इनका पीने का भी कार्यक्रम है. वैसे भी उनकी पीने की आदत थी ही।

मैंने उनसे पूछा- मैनेजर कब तक आयेंगे?
तो उन्होंने कहा- 7 बजे आयेंगे. तुम भी अच्छे से तैयार रहना, घर के कपड़ों में मत रहना.
मैं 'ठीक है' बोल कर अपने काम में लग गई।

शाम साढ़े 6 बजे मैं तैयार हो गई एक गुलाबी रंग की हल्की सी साड़ी और उस पर काले रंग का ब्लाउज पहनी थी। ब्लाउज पीछे से गहरे गले का था जिसमे से मेरी गोरी पीठ मस्त दिख रही थी,

7 बजे दरवाजे की घंटी बजी. उस वक्त पति बाथरूम में थे तो मैं तुरंत गई और दरवाजा खोला.
सामने देखा तो एक 40-45 साल का लम्बा चौड़ा पंजाबी आदमी खड़ा था, उसने मेरे पति को पूछा तो मैं बोली- घर पर ही हैं, आप आइये।
और उसको अन्दर बुला लिया.

कुछ देर में मेरे पति भी आ गए और उन्होंने मेरा परिचय उनसे करवाया. उनका नाम सुखविन्दर था.
उसके बाद मैं अन्दर चली गई और दोनों बातें करने लगे।
मैं अन्दर खाना बनाने लगी।

मैं खाना बना रही थी और वहाँ रसोई से सुखविन्दर मुझे साफ़ साफ़ दिख रहे थे और वो भी मुझे देख पा रहे थे।
मैं अपने काम में लगी रही.

कुछ देर में पति आये और दो ग्लास और सोडा की बोतल और काजू लेकर चले गए.

इधर मैं खाना बना रही थी और उधर वो दोनों शराब पीने में व्यस्त थे। सुखविन्दर बार बार मुझे देखे जा रहा था। कई बार मुझे देख मुस्कुरा भी देता तो मैं भी मुस्कुरा कर उनका अभिवादन कर देती.
मगर उनके प्रति कुछ गलत मेरे मन में नहीं था, वो मुझसे काफी बड़े उम्र के भी थे. उस वक्त मैं 22 साल की थी।

करीब 40 मिनट बाद उन दोनों ने शराब ख़त्म कर ली तो मैंने खाना लगाया.
वो दोनों खाना खाने लगे मगर सुखविन्दर मुझे भी साथ खाने को कहने लगे। मैंने अपने पति की तरफ देखा तो उन्होंने भी कह दिया- तुम भी खा लो यहीं हमारे साथ!
मैं भी अपना खाना ले आई और साथ बैठ कर खाने लगी.

सुखविन्दर मेरे खाने की बहुत तारीफ कर रहे थे और साथ में पति को बोल रहे थे- तुम्हारी बीवी बहुत अच्छा खाना बनाती है.
और मुझे बोले- तुम जितनी सुन्दर हो, उतना ही अच्छा खाना बनाती हो।
अपनी तारीफ सुन कर मुझे अच्छा लग रहा था।

उन दोनों को ही शराब चढ़ चुकी थी. मेरे पति अब खाना ख़त्म कर चुके थे और हाथ धो कर सामने वाले कमरे में चले गए, मैं बस उनका साथ दे रही थी।
वो बार बार मेरी तरफ देख रहे थे मुझे उनका इस तरह देखना अच्छा नहीं लग रहा था।

अचानक मैंने गौर किया कि वो मेरे उभरे हुए वक्ष को बार बार देख रहे हैं. मैंने अपने ब्लाउज की तरफ देखा तो मेरी ब्रा की पट्टी ब्लाउज से बाहर निकल गई थी, वो उसे ही देख रहे थे.
मैंने साड़ी से उसको ढक लिया।

कुछ देर बाद हम दोनों ने खाना ख़त्म किया और वहां से उठकर हाथ धोने बाथरूम गए।
मैं उनको रास्ता दिखाते हुए आगे चल रही थी; पीछे से मेरी ब्लाउज को देख कर उन्होंने कहा- तुम्हारी ब्लाउज की डिजाईन काफी अच्छी है।
मैं समझ गई कि वो मेरी पीठ देख कर बोल रहे हैं.

बाथरूम जाकर मैं उनके हाथ में पानी डालने लगी वो हाथ धोकर बाहर आ गए. मैंने भी हाथ साफ़ किये और बाहर आ गई,
हम दोनों बाहर कमरे में गए तो देखा कि मेरे पति सो चुके हैं।

मैं उनको उठाने लगी तो सुखविन्दर ने मना कर दिया और बोले- कोई बात नहीं, रहने दो, उनको सोने दो; मैं अब चलता हूँ।
और वो दरवाजे की तरफ चल दिए.

जैसे ही दरवाजा खुला तो हमने देखा कि बाहर बारिश हो रही है। तब उन्होंने कहा- कुछ देर रुकना ही सही है, नहीं तो भीग जाऊँगा।
अब हम दोनों वहीं बाहर वाले कमरे में ही बैठकर बातें करने लगे।

उन्होंने कहा- तुम्हारे पति काफी किस्मत वाले हैं कि तुम जैसी हसीन बीवी मिली, काश तुम मेरी बीवी होती।
मैंने तुरंत कहा- क्या?
"वही जो तुमने सुना!"
इतने में मैं शर्मा गई और नज़र नीचे कर के बोली- ये सब क्या बोल रहे हैं आप?

वो भले नशे में थे मगर मेरे शर्म को भाम्प गए और मेरे पास आ गए, बोले- बिल्कुल सही कह रहा हूँ तुम अगर मेरी बीवी होती तो बात ही कुछ और होती। क्या मैं और तुम दोस्त बन सकते हैं?
उनके इस सवाल का जवाब नहीं दे पाई मैं!

वो फिर से पूछने लगे- बताओ क्या मैं तुम्हारा दोस्त बन सकता हूँ?
मैंने उनकी तरफ देखा और हां में अपना सर हिला दी।
वो काफी खुश हुए और मेरे हाथ को अपने हाथ में थाम कर और बोले- धन्यवाद मुस्कान!
और फिर हम दोनों में फ़ोन नम्बर का आदान प्रदान हुआ।

मेरे पति इन सब बातों से अनजान आराम से सो रहे थे।

कुछ देर में बारिश बंद हुई तो वो चले गये.


अगले दिन से ही जब भी मेरे पति घर पे नहीं होते तो उनका फ़ोन आने लगा। हम दोनों में काफी देर तक बातें होती रहती थी.
धीरे धीरे हम दोनों खुल गए और हम दोनों में गर्म बातें भी होने लगी थी। अब उनके फ़ोन का मुझे भी इंतजार रहने लगा। अब वो भी मुझे अच्छे लगने लगे थे.

ऐसे ही 2 से 3 महीने बीत गए।

फिर एक दिन मेरे पति ने घर आ कर बताया कि उनका प्रोमोशन हो गया है.
उस दिन हम दोनों बहुत खुश थे।

अगले दिन सुखविन्दर का जब फ़ोन आया तो पता चला कि इसमें उनका बहुत बड़ा हाथ है।
मैंने उनको धन्यवाद दिया।
मेरे पति का प्रमोशन होने के बाद अब वो शहर से बाहर भी जाने लगे कंपनी के काम से।

मेरी और उनके मैनेजर की दोस्ती ऐसे ही चलती रही। अब तो मेरे पति के न रहने पर घर भी आ जाते थे। मगर हम दोनों में कभी कुछ गलत काम नहीं हुआ।

एक दिन मेरे पति ने मुझे बताया- मुझे 5 दिनों के लिए बाहर जाना है, तुम यहाँ अकेली क्या करोगी, अगर चाहो तो तुम भी अपने मायके चली जाओ।
मगर मैंने मना कर दिया, मैंने कहा- मुझे कोई परेशानी नहीं, आप आराम से जा सकते हो।
दो दिन बाद मेरे पति चले गए।

सुबह 10 बजे सुखविन्दर का फोन आया. उनको पता था कि पति जाने वाले है.
हम दोनों में बात शुरू हुई और उन्होंने मुझसे मिलने के लिए कहा। वैसे तो वो घर आते रहते थे मगर उस दिन मेरे मन में कुछ अज़ीब सा लग रहा था जैसे कुछ अलग होने वाला है। अपने जिस्म की आग के चलते मैंने शाम को उनको घर आने के लिए कह दिया।

वो ठीक 7 बजे घर आये, उस दिन मैंने लाल रंग की साड़ी पहनी थी।
उनके हाथ में एक बैग था।
मैंने पूछा तो उन्होंने बताया- मैं अपने घर में बोल के आया हूँ कि कुछ दिन के लिए बाहर जा रहा हूँ. और ऑफिस से भी मैंने छुट्टी ले ली है। मुझे कुछ दिन तुम्हारे साथ बिताने हैं. क्या मैं कुछ दिन तुम्हारे साथ रह सकता हूँ।
ऐसा सुन के तो मैं दंग रह गई, मैं तुरंत बोली- अगर किसी को पता लगा तो बहुत बुरा हो सकता है, ऐसा मत कीजिये।

तो वो समझाते हुए बोले- एक भी चिंता की बात नहीं है किसी को कुछ पता नहीं चलने वाला।
फिर कुछ देर हम दोनों ने वहीं सामने रूम में बात की और फिर मैं खाना बनाने के लिए चली गई और वो टीवी देखने लगे।

खाना बनाते हुए बार बार मेरे मन में एक ही ख्याल आ रहा था कि ये मुझसे क्या चाहते हैं? कहीं इनका इरादा सेक्स करने का तो नहीं। यह सोच के मन में तो गुदगुदी होने लगी। मुझे लगा कि मेरे जिस्म की आग में आज इनके लंड का पानी पड़ने वाला है.
फिर हम दोनों ने साथ में खाना खाया।

इसके आगे क्या हुआ, यह मैं अपनी जिस्म की आग की हिंदी सेक्स कहानी के अगले भाग में बताऊँगी।



शहर में जिस्म की आग बुझाई-2

हम दोनों टीवी देख रहे थे और वो मेरे बगल में ही बैठे हुए थे।
अचानक से उन्होंने टीवी बंद कर दिया।
मैंने पूछा- क्या हुआ?
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा- मुस्कान मैं तुम्हारा साथ चाहता हूँ।
मैं- मतलब?

"मेरी बीवी को गुजरे हुए 10 साल हो गए, तब से मैं बहुत अकेला हूँ। तुम्हारे जैसी दोस्त पाकर मेरा अकेलापन कुछ दूर हुआ है, मगर मैं इस रिश्ते को कुछ आगे बढ़ाना चाहता हूँ मगर तुम्हारी रजामन्दी के साथ!"
"मैं कुछ समझी नहीं ... आप क्या बोलना चाहते हैं. मैं तो आपकी दोस्त हूँ ही! फिर क्या?

वो कुछ रुक कर बोले- मैं तुम्हारे साथ वो सब करना चाहता हूँ जो एक पति पत्नी करते हैं।
मेरा दिल तो पहले से ही जानता था कि वो यही कुछ बोलेंगे मगर मैं चौंकते हुए बोली- यह आप क्या कह रहे हैं, आप मेरे अच्छे दोस्त हैं और हम दोनों की उम्र में भी काफी फासला है।

वो मेरे हाथों को अपने हाथों में लेते हुए बोले- जैसा कह रही हो, वो तो सच है. मगर दोस्ती के रिश्ते को अगर प्यार का नाम दे दिया जाये तो क्या बुराई है? और इन सब में उम्र नहीं देखी जाती।
अगर तुम तैयार हो तो बोलो ... नहीं तो हम दोस्त तो हैं ही।
मैं कुछ भी बोल नहीं रही थी, मेरी साँसें तेज चल रही थी।

उन्होंने मेरे चेहरे को अपने हाथों से ऊपर उठाया। मैं उनसे आँखें नहीं मिला रही थी. मेरा कुछ न बोलना शायद मेरी इजाजत थी।
मेरे तन की जो प्यास थी जिस्म की आग ... वही ये सब करवा रही थी शायद!

उन्होंने मेरे गालों को अपने दोनों हाथों से थाम रखा था और अपने होंठ मेरी तरफ बढ़ा रहे थे।
मैंने उनको रोकते हुए कहा- आप जो चाहते हैं, वो हो तो सकता है पर यह बात किसी को पता नहीं चलनी चाहिए।
वो तुरन्त बोले- कभी पता नहीं चलेगा, मुझ पर भरोसा रखो।

और वो खड़े हो गए और मेरा हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया। मैं सीधे उनके सीने से जा लगी. मेरी कमर को एक हाथ से पकड़ते हुए उन्होंने अपने होंठ मेरे होंठों पे लगा दिए और मेरे होंठों को बेइंतहा चूमने लगे।
कुछ ही देर में मेरे होंठ भी चलने लगे और मैं उनका साथ देने लगी।

दस मिनट में ही मेरी साड़ी फर्श पर पड़ी थी। मेरा गदराया हुआ बदन अपने आगोश में पाकर वो जोश से भर गए थे।
मैंने उनको रोकते हुए कहा- नहीं नहीं यहाँ नहीं ... अंदर चलो.
उन्होंने मुझे तुरंत अपनी गोद में उठा लिया और बैडरूम में ले गए।

वहां मुझे खड़ा करके अपनी शर्ट उतार फेंकी और तुरंत मुझे अपनी बांहों में ले कर अपने सीने से लगा लिया.
मेरी गदराई पीठ को सहलाते हुए वे बोले- मुस्कान, कसम से जब से तुमको पहली बार देखा था, तब से तुमको पाना चाहता था. 10 साल से मैं किसी औरत का सुख नहीं पाया और आज तुम जैसी औरत मिली है मुझे! तुमको पाकर तो मेरी जिंदगी बन गई।
ऐसा बोलते हुये उन्होंने मेरे पेटीकोट का नाड़ा भी खोल दिया, पेटीकोट अपने आप नीचे सरक गया।
अब तो मैं ब्लाउज और चड्डी में ही रह गई थी।


मैं बोली- एक बात बोलूँ?
"हां बोलो न!"
"लाइट बंद कर दो न ... मुझे शर्म आ रही है!"
"अरे नहीं मेरी जानू ... मुझे तुम्हारी हर एक जगह की सुन्दरता देखनी है। आज तक बस बाहर से ही तुमको देखा है, आज तो अन्दर की खूबसूरती देखनी है।"
और मेरे ब्लाउज के हुक एक एक करके खोलने लगे.

मेरी आँख अपने आप बंद हो गई। धीरे से उन्होंने मेरे ब्लाउज को मेरे जिस्म से अलग किया।
मेरे दोनों बड़े बड़े दूध ब्रा के बाहर निकलने को बेताब थे. अपने दोनों हाथ मेरे पीछे लेजा कर ब्रा की हुक भी उन्होंने खोल दी और मेरे दूध आजाद होकर उनके सामने तन गए.

उनको देख कर बोले- वाओ यार मुस्कान ... तुम कितनी गोरी हो मेरी जान!
दोनों हाथों से मेरे दोनों दूध को छूते हुए बोले- इतने टाईट ... ऐसा लगता है कि कभी किसी ने छुआ तक नहीं है।

अब उन्होंने भी अपनी पैंट उतार दी और अब वो केवल चड्डी में ही थे।

वो बोले- मुस्कान अगर बुरा न मानो तो एक बात कहूँ?
मेरी आँखें अब तक बंद ही थी, वैसे ही मैंने कहा- हाँ बोलिये न!
"तुम्हारा कसा हुआ ये गोरा बदन देखकर किसी का भी पानी निकल जाये कसम से! ऐसा फिगर बहुत किस्मत वाली लड़की के पास होता है. लगता ही नहीं कि तुम अभी 23 साल की हो. ऐसे दूध इतनी कम उम्र में किसी किसी के ही होते हैं।

ऐसा बोलते हुये उन्होंने अपनी दोनों बांहों को फैला कर मुझे अपनी बांहों में भर लिया. उनका नंगा बदन जब मेरे नंगे बदन से टकराया तो मेरी चिकनी चूत लबलबा गई, पूरे जिस्म में बिजली दौड़ गई।
उनका सख्त हाथ मेरी चिकनी पीठ को सहलाने लगा और मेरे दूध उनके सीने से चिपक गए. उनका शरीर काफी मजबूत था. मुझे अपने से चिपकाये हुए अपने सीने से ही दूध को रगड़ रहे थे. उनके सीने के बालों से मेरे दूधों में चुभन हो रही थी मगर मजा भी बहुत आ रहा था।

वो मेरी पीठ सहलाते हुए अपने हाथों को मेरी कमर और फिर मेरी गांड में ले गए। मेरी चड्डी के ऊपर से ही मेरी गांड को दबा रहे थे। उनका सख्त लंड मेरी पुद्दी से आकर चिपक गया. उनके लंड का स्पर्श पा कर ही मैं समझ गई कि उनका लंड कोई आम लंड नहीं है क्योंकि चड्डी के अंदर से ही काफी मोटा महसूस हो रहा था।

अब उन्होंने मेरे एक जांघ को उठा कर अपनी कमर के पास टिका लिया और एक हाथ से मेरी चिकनी मोटी जांघ सहलाते हुए मेरे होंठों को चूसने लगे। मेरे जिस्म में अज़ीब वासना की लहर दौड़ पड़ी। मेरी पुद्दी से जोरों से पानी निकलने लगा जिससे मेरी चड्डी गीली हो गई।

मेरी जानघ सहलाते हुए उन्होंने अपना हाथ चड्डी के अन्दर से मेरी चूतड़ में डाल दिए और मेरी गदराये चूतड़ को दबाने लगे। अपनी एक उंगली को मेरी गांड के छेद पर ले जा कर छेद को नाख़ून से हल्के हल्के कुरेदने लगे।

मैं आप लोगों को बता दूँ कि आज तक मैंने कभी गांड में लंड नहीं लिया था। क्योंकि मेरे पति ने कभी वहां से कुछ करने की कोशिश ही नहीं की। इसलिए मेरी गांड अभी तक कुवारी ही थी।
मगर सुखविन्दर के ऐसा करने से पता नहीं क्यों मुझे शक हो रहा था कि कहीं ये मेरी गांड तो नहीं चोदने वाले।

हम दोनों ऐसे ही खड़े खड़े एक दूसरे के आलिंगन में थे। दोनों ही केवल चड्डी में थे और वासना से भरे हुये थे। मुझे उस वक्त एक बार भी ये ख्याल नहीं आया कि मैं किसी गैर मर्द की बांहों में हूँ, ऐसा लग रहा था जैसे मैं तन की प्यास में अन्धी हो गई हूँ।

करीब दस तक हम दोनों का ये आलिंगन चलता रहा। उसके बाद मुझसे वो अलग हुए और मुझे अपनी गोद में उठा कर बिस्तर पर लेटा दिए। मैं लगभग पूरी नंगी एक गैर मर्द के सामने लेटी थी।

अब एक झटके में सुखविन्दर ने अपनी चड्डी को उतार दिया और मैंने पहली बार उनके लंड के दर्शन किये.
कसम से दोस्तो ... उस वक्त मेरी आँखें फटी की फटी रह गई। मैंने कभी नहीं सोचा था कि लंड इतना बड़ा भी हो सकता है।
मेरे पति का तो 5 से 6 इंच का ही था।
मगर उनका लंड साढ़े 8 इंच लम्बा और ढाई इंच मोटा था; दिखने में एकदम काला और चमकदार ... मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह किसी 42 साल के आदमी का है।
दोस्तो, उनका लंड देखकर मैं इतना तो समझ गई थी कि आज चुदाई में मेरी क्या हालत होने वाली है।

मैं बिस्तर पर लेटी उनके लंड को एकटक देखे जा रही थी।
उन्होंने अपने हाथ से लंड को सहलाते हुए मेरी तरफ देखा और पूछा- पसंद है?
मैंने शर्मा कर अपना चेहरा दूसरे तरफ कर लिया।

अब वो भी बिस्तर पर आ गए और मेरे पैरों के पास बैठ कर मेरी चड्डी एक झटके में उतार कर नीचे फर्श में फेंक दी. मैं अपने हाथों से अपनी पुद्दी को छुपाने लगी मगर उन्होंने मेरे हाथ हटा दिए।
मेरी पुद्दी देखकर वो बोले- आज 10 साल के बाद किसी फुद्दी को देख रहा हूँ. वो भी इतनी खूबसूरत! जितनी सुन्दर तुम हो उतनी ही सुन्दर तुम्हारी फुद्दी भी है।
मेरी पुद्दी को हाथ से सहलाते हुए अपने मुँह को उसके पास ले गए और उसकी खुशबू लेते हुए बोले- जान तुम्हारी तो किसी कुवारी लड़की की तरह लग रही है। इसको देखकर साफ़ पता चलता है कि तुम्हारे पति ने इसका अच्छे से ख्याल नहीं रखा है।

उन्होंने मुझसे पूछा- मुस्कान, अगर बुरा न मानो तो एक बात बोलूं?
मैं चेहरा दूसरे तरफ किये हुए बोली- जी हां बोलिये, मैं क्यों बुरा मानूँगी।

"तुम जिस प्रकार की औरत हो ... मतलब जिस तरह तुम्हारा बदन है भरा हुआ ... गदराया हुआ ... वैसा तुमको पति नहीं मिला. तुमको तो किसी गबरू मर्द की जरूरत है जो तुमको सन्तुष्ट कर सके। तुम्हारी फुद्दी को देख कर पता चल रहा है कि तुम्हारे पति का लंड उस काबिल है ही नहीं।"

इतना कहते हुए वो मेरे ऊपर आ गए और मेरे कान में आकर धीरे से बोले- अब तुम चिंता मत करो, अब तुम्हारी प्यास को मैं मिटाऊँगा। मगर इसके लिए तुम्हें मेरा हर तरह से साथ देना होगा।
मैं बोली- कैसा साथ?
"मैं तुम्हारे साथ जो कुछ भी करूँगा, तुम मना नहीं करोगी क्योंकि मैं तुम्हारे साथ हर तरह से मजा लेना चाहता हूँ। अगर जोश में मैं गाली भी दे दूँ तो तुम बुरा मत मानना, मेरे अन्दर बहुत हवस है मगर वो कभी पूरी तरह बाहर नहीं आई है क्योंकि मेरी बीवी कभी इस तरह तैयार ही नहीं हुई थी और उसके गुजर जाने के बाद कभी कोई मिली नहीं। मगर तुमको देखकर लगता है कि तुम मेरी वो हवस को पूरा करने के लायक हो, तुम्हारा जिस्म उस लायक है। अगर तुम मेरा साथ देती हो तो वादा करता हूँ कि हम दोनों चुदाई के इस खेल का बहुत मजा लेने वाले हैं।

मैंने कुछ कहा तो नहीं पर अपना सर हिला कर अपनी सहमति दे दी।

आगे मेरी इस जिस्म की आग की कहानी में क्या क्या हुआ, यह जानने के लिए कहानी का अगला भाग जरूर पढ़ें।

शहर में जिस्म की आग बुझाई- 3

मेरी अब तक की कहानी आपने पढ़ी; उम्मीद करती हूँ कि जिस्म की आग की कहानी आपको पसंद आ रही होगी।
अब आगे चलते हैं कहानी में क्या हुआ।

उसके बाद वो फिर से मेरे पैर के पास चले गए और मेरे एक पैर को उठा कर उँगलियों की तरफ से चूमना शुरू किये और धीरे धीरे मेरी जाँघों तक चूमने लगे. मेरा तो रोम रोम खड़ा हो गया, मेरी गोरी गोरी जांघ अपने आप मचलने लगी।

ऐसा करते हुए वो मेरे पेट तक पहुँच गए और मेरी नाभि में अपने होंठ डाल कर चाटने लगे।
मेरे मुँह से नशीली सिसकारी निकलने लगी- आआअह्ह ह्ह्हऊऊऊ अओओ ओओह्ह ह्ह्ह शीस्स्स स्स्सस्स ... आआअह्ह ईईईई!

ऐसा करते हुये वो मेरे दूध तक पहुँच गए, मेरे एक निप्पल को अपने मुँह में भर लिया और एक दूध को अपने हाथों से मसलने लगे. मेरे दूध वास्तव में इतने बड़े हैं कि उनको भी काफी मजा आ रहा था।

मेरा बदन भी अब उबाल मारने लगा, मेरे जिस्म की आग भड़क रही थी. मैंने भी उनका सर अपने दूध में दबा लिया। उनके दूध दबाने से काफी दर्द हो रहा था मगर आज मैं सभी दर्द को सहन कर लेना चाहती थीं।

उन्होंने मेरे दोनों हाथ को ऊपर किये और मेरी बगलों को जीभ से चाटने लगे। मुझे काफी गुदगुदी हो रही थी और मैं मचलने लगी।

उसके बाद उन्होंने मेरे चूचों पर हमला सा कर दिया और निप्पल के बगल में दांतों से काटने लगे और दूसरे को काफी जोर से मसलने लगे. मेरी तो हालत ख़राब हो गई; मजा के साथ साथ दर्द भी हो रहा था। मैं जोर से चिल्लाई- नहीं ईईई ई ई ईई दर्द होता है ... नाआआआआ!
वो बोले- होने दे जान; आज तुझे खा जाऊँगा।

काफी देर तक ऐसा करने के बाद उन्होंने मुझे छोड़ा, मेरे दूध पर जगह जगह काटने के निशान पड़ गए थे और दूध एकदम लाल हो गए थे।

अब वो मेरे कमर को चूमते हुए नीचे की तरफ जा रहे थे और मेरी पुद्दी के पास जाकर मेरी दोनों जाँघों को एक झटके में फैला दिया।

मेरी पुद्दी पूरी फैल गई और उन्होंने अपने सर को उसमें झुका दिया और अपनी जीभ निकालकर पूरी पुद्दी को चाटने लगे।
मेरी पुद्दी में एक भी बाल नहीं था. उसमें से निकल रहा पानी वो पूरा का पूरा चाट गए।

उनकी खुरदरी जीभ से मुझे बहुत मजा आ रहा था, वो पूरी जीभ को ऊपर नीचे करते हुए चाट रहे थे। मैं तो बस अपने बदन को नागिन की तरह हिला रही थी और बस मुँह से सिसकारी ही निकल रही थी- आअह्ह उम्म्ह… अहह… हय… याह… आआ ऊऊईईई आऊच उईईई माँआआहन ह्ह्ह्ह आआअह्ह बसस्स स्स्स्स्स करोओओओओ आआअह्ह्ह ... नहीं ईईई ईईई नाआआआ!
मगर वो कहाँ रुकने वाले थे.

और कुछ ही पल बाद मैं झड़ गई और अपनी गांड हवा में कर दी। मेरी पुद्दी से पानी निकलता जा रहा था और वो चाटते जा रहे थे।

अब उन्होंने मेरे गांड के छेद को हाथ से थोड़ा ऊपर किया और जीभ को उस पर गोल गोल घुमाने लगे, मेरा छेद अपने आप अज़ीब तरह से अन्दर बाहर होने लगा।
कुछ देर ऐसा करने के बाद वो फिर से मेरी पुद्दी को चूमने लगे और मैं कुछ ही देर में दुबारा गर्म हो गई।

अब मुझे सहन नहीं हो पा रहा था मेरी कमर अपने आप ऊपर नीचे होने लगी।
इस बात को वो भी समझ गए, देर न करते हुए वो वहां से हट गए और अपने लंड को आगे पीछे करते हुए मुझसे पूछा- क्या तुम इसको अपने मुँह में लेना पसंद करोगी?
मैं बोली- अभी नहीं ... बाद में!

ऐसा सुनने के बाद वो मेरी पुद्दी के पास बैठ गए और लंड के सुपारे को पुद्दी पर रगड़ते हुए बोले- अब तैयार हो न तुम?
मैंने बस थोड़ी सी मुस्कान के साथ अपना सर हिला दिया।
वो मेरे ऊपर आ गए।

मेरे दोनों पैर अपने आप फैल गए और उनका लंड मेरे जाँघों को सहलाता हुआ पुद्दी के पास आ गया।
वो मुस्कान के साथ बोले- देखा लंड को भी पता है कि उसकी जगह कहाँ है अपने आप वहां पहुंच गया।
मैं बस शर्मा के रह गई।

उन्होंने मेरे कान में आकर कहा- डाल दूँ?
"हां ... पर आराम से!"
"क्यों?"
"आपका बहुत बड़ा है, दर्द होगा।"
"नहीं होगा जानेमन, चिंता मत करो। तुझे बहुत प्यार से चोदना है."
"छीईईईई ईईई ईई ... कितना गन्दा बोलते हो आप!"
"गन्दी बात में ही तो मजा है मेरी जान!"

इतना बोलते हुये उन्होंने अपना एक हाथ नीचे ले जाकर लंड को पुद्दी पर थोड़ा रगड़ा और फिर छेद में सेट करके मुझे कसके अपनी बांहों में लेकर सीने से चिपका लिया। उनके दोनों हाथ मेरी पीठ को जोर से थाम लिए और अपने दोनों घुटनों से मेरी जांघों को फैला दिया।
अब मेरी चुदाई होने की पूरी तैयारी थी।

अब उन्होंने धीरे से अपनी कमर पे जोर देना शुरू किया और लंड अन्दर छेद में फिसलना शुरू हुआ. मगर उनका सुपारा काफी बड़ा था और छेद छोटा ... तो जा नहीं रहा था।
मुझे भी दर्द महसूस हो रहा था।

उन्होंने मुझे हाथ से पुद्दी को फैलाने के लिए कहा।
मैंने अपनी उँगलियों से पुद्दी को थोड़ा चौड़ा किया और उनका सुपारा छेद में सेट हो गया।
उन्होंने मेरे गालों को चूमते हुए एक हल्का सा धक्का लगाया।

"ऊऊऊऊईईईईई माआआआआअ ...!"
फच से सुपारा छेद में घुस गया। मैंने भी उनको कसके जकड़ लिया।
वो बहुत ही अनुभव के साथ लंड पेल रहे थे ताकि मुझे ज्यादा तकलीफ ना हो।

उन्होंने मुझसे पूछा- क्या तुम तैयार हो?
"हां ..."
"डाल दूँ तो फिर?"
"हां ..."

इसके बाद तो वो हुआ जिसके बारे में मैंने सोचा नहीं था।
उन्होंने अपनी कमर थोड़ी पीछे की और एक जोरदार धक्का लगा दिया और एक बार में पूरा का पूरा लंड मेरी पुद्दी में उतार दिया।
"आआआ आआअह्ह्ह ह्ह्ह्ह ...! मर गईईईई ईईईईई, आआ आआआअह्ह्ह ह्ह्ह ... अह्ह्ह आआअह्ह उम्म्ह ... अहह ... हय ... ओह ... निकालो उसे ... मैं मर जाऊँगी।
मेरी आँखों से तुरंत ही आंसू आ गए.

उन्होंने मुझे इतनी ताकत से अपनी आगोश में जकड़ रखा था कि मैं हिल भी नहीं पा रही थी।
पूरा का पूरा लंड मेरी पुद्दी को चीरता हुआ बच्चेदानी तक जा पंहुचा था।
मेरी तो आवाज भी नहीं निकल पा रही थी।

उनके वजन के कारण मैं दबी जा रही थी। उनका वजन 90 किलो से कम नहीं रहा होगा, और मैं 68 किलो की थी। मेरे दूध उनके सीने के नीचे बुरी तरह दबे हुए थे। उन्होंने अपने हाथों के नाख़ून मेरी पीठ पर दबा दिए थे मैंने भी उनकी पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए थे।

मैं किसी तरह उस दर्द को सह रही थी. मैं जानती थी कि ये दर्द बस कुछ ही पल का है।

उन्होंने एक दो बार लंड को आधा बाहर निकाल कर अन्दर डाला और लंड अच्छे से पुद्दी में सेट हो गया।
कुछ देर तक वो ऐसे ही मेरे ऊपर लेटे रहे और कुछ ही देर में मेरा दर्द कम हो गया, मैं सहज हो गई।

उन्होंने धीरे धीरे लंड को अन्दर बाहर करना शुरू किया। लंड इतना मोटा था कि फुद्दी से चिपक के अन्दर जा रहा था. हर बार मेरी आआअह्ह निकल रही थी, उसमें थोड़ा दर्द और थोड़ा मजा दोनों था।
अब उन्होंने अपने दोनों हाथ से मेरी जाँघों को फंसा लिया और मेरे दोनों पैर अब हवा में हो गए। अब उन्होंने असली चुदाई शुरू की, वो बहुत ही जोर जोर से धक्के लगाने लगे, मैं बहुत ही तेज़ चिल्लाये जा रही थी- ऊऊउईईई आआअह्ह आआह नहींईईई बसस्सस्स स्स्स नहीं ईईई आआअह्ह्ह आअह बसस्स बस्स्स करोओओओ ... नहींईईई नाआआ!

मगर वो कहाँ मानने वाले थे, वो बिल्कुल अन्धाधुन्ध धक्के लगा रहे थे। उनका हर धक्का मेरी पुद्दी पर फट फट बज रहा था, पूरा बिस्तर जोर जोर हिल रहा था.

वास्तव में उस वक्त ही मुझे पता लगा कि चुदाई कैसी होती है। मैं जान गई थी कि पुद्दी का भर्ता कैसे बन जाता है, वो ऐसी ही चुदाई से बनता है। मेरा पूरा गोरा बदन लाल हो गया था।

वो इतनी तेज़ी से और इतनी जोर से धक्का लगा रहे थे कि मानो कोई मशीन चल रही हो! मेरे दोनों दूध उनके सीने के नीचे दब कर बहुत तेज़ दर्द कर रहे थे। मैंने तो कभी नहीं सोचा था कि कभी इतना बड़ा लंड ले पाऊँगी।

उनको चोदते हुये 7 से 8 मिनट हो गये थे कि मेरा बदन अकड़ने लगा और मैं झड़ गई और उसके तुरंत बाद वो भी अपना पानी मेरी पुद्दी में भर दिये और मेरे ऊपर ही लेटे रहे।
लंड अभी भी पुद्दी में ही था।

कुछ देर में लंड अपने आप ढीला होकर बाहर आ गया, मेरी पुद्दी से थोड़ा थोड़ा वीर्य बाहर आ रहा था. मैं भी चुपचाप लेटी रही। आज पहली बार ऐसी चुदाई करवा कर मस्त हो चुकी थी मैं!
अब तो ऐसा लग रहा था कि बस ऐसे ही लेटी रहूँ।

मगर मुझे क्या पता था कि खेल अभी शुरू हुआ था।

हम दोनों नंगे लेटे हुये थे।
मैंने अपना मुंह दूसरी तरफ कर लिया और अपने ही ख्यालों में खोई हुई थी। मेरी गांड सुखविन्दर के तरफ थी।

अचानक से वो मुझसे लिपट गया और अपने एक हाथ से मेरे दूध को दबाते हुए बोला- कैसा लगा जान?
"बहुत अच्छा।"
"मजा आया?"
हाँ ..."

उसने मेरी गांड को थोड़ा फैलाते हुये अपने लंड को गांड की दरार में फंसा दिया. गर्म गर्म लंड का स्पर्श मुझे काफी अच्छा लग रहा था।

उन्होंने मेरी पीठ को चूमते हुए कहा- जान सच कहूँ अगर तुमको बुरा न लगे तो?
"हाँ कहिये ना?"
"तुम सच में मेरे लायक हो, तुम जैसी मदमस्त गदराई हुई औरत मुझे बहुत पसंद है। क्या तुम हमेशा मेरा ऐसे ही साथ दोगी?"
"हाँ क्यों नहीं दूँगी, आप जैसा कहेंगे, करूँगी. मगर ये सब बात किसी को पता नहीं लगनी चाहिए बस।"
कभी नहीं, किसी को भी नहीं ... बस हम दोनों तक ही रहेगी।"

ऐसा कह कर उन्होंने मेरे गले में चूमना शुरू किया और कहा- मुझे और करना है, क्या तुम तैयार हो?
"कितना करोगे? इतनी देर तक तो किये हो।"
"अभी मन नहीं भरा है मेरा!" ऐसा कह कर मुझे पेट के बल कर दिये और मेरे ऊपर आ गये, मेरी पीठ को चूमते हुए मेरी कमर को और फिर मेरी गांड तक पहुँच गए। मेरी गद्देदार गांड को फैला कर अपना मुंह उसमें दबा दिया और जीभ से फुद्दी को चाटने लगे।

मेरी सिसकारी फिर से निकलने लगी, अब तो मेरी शर्म भी जैसे खत्म हो गई थी, मैंने कहा- कितने गन्दे हो ...आप क्या क्या करते हो?
"इसमें गन्दा कुछ नहीं है मेरी जान! तू चीज ही ऐसी है कि लगता है खा जाऊँ तुझे! बहुत किस्मत वाला हूँ मैं जो तू मुझे मिली है। तेरी जैसी माल को तो कोई भी चाटना पसन्द करेगा।" ऐसा कहते हुए उसने दोनों हाथ से गांड को फैला दिया और अपनी जीभ को पुद्दी पर और गांड के छेद पर फिराना शुरू किया।

मैंने भी अपनी गांड थोड़ा हवा में उठा दी और मजा लेने लगी।
कुछ देर तक चाटने के बाद जब उन्हें लगा कि मैं तैयार हूँ तो मेरी पीठ पर लेट गये और एक हाथ से लंड को फुद्दी में लगा दिया और एक हल्का सा धक्का दिया, लंड का सुपारा छेद में घुस गया।

उन्होंने पूछा- अब तो दर्द नहीं हो रहा?
"नहीं हो रहा!"

ऐसा सुनते ही उन्होंने एक और जोर का धक्का देकर पूरा का पूरा लंड पुद्दी में उतार दिया और मेरी कमर को दोनों हाथ से पकड़ के मुझे चोदना शुरू कर दिया।
उन्होंने अपनी रफ्तार तेज़ कर दी और मेरे चूतड़ों पर उनका हर धक्का फट फट बजने लगा।
इस बार तो वो और तूफानी अन्दाज में चुदाई कर रहे थे।

कुछ देर तक चोदने के बाद मुझे घोड़ी बनने के लिए बोले और मैं घोड़ी बन गई। इस तरह से तो उनका लंड और भी टाईट लग रहा था। वो मेरे चूतड़ों को पकड़ के दनादन चुदाई किये जा रहे थे।

करीब 10 मिनट तक ऐसे चोदने के बाद उन्होंने लंड बाहर निकाल लिया और मुझे फिर से पेट के बल लेटा दिया और बोले- जान अब तुम्हें थोड़ा दर्द और सहन करना होगा।

दोस्तो आगे अभी कहानी बाकी है. इन्तजार कीजिये जिस्म की आग की कहानी के अगले भाग का!

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