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मौसी और अकटारा को चोदा – देसी कहानी

बावले उतावले

बावले उतावले-1

दोस्तो, मेरा नाम सूरज है, मैं गाजियाबाद में रहता हूँ। शादी हो चुकी है, एक बेटा भी है। बीवी अच्छी है, शादीशुदा जीवन भी अच्छा चल रहा है। अन्तर्वासना का मैं पाठक हूँ। अकसर कहानियाँ पढ़ता हूँ, मेरी बीवी भी मेरे साथ ही बैठ कर कहानियाँ पढ़ती है और फिर बाद में जैसे कहानी में होता है, वैसे ही हम भी रोल प्ले करते हैं।
हम दोनों आपस माँ बेटा, बाप बेटी, भाई बहन, दोस्त, प्रेमी, मालिक नौकरनी, हर तरह के कैरक्टर को खेल चुके हैं। हम दोनों ने आपस में एक दूसरे से कुछ नहीं छुपाया।

आपको जान के हैरानी होगी, मैं उस आदमी से भी मिला हूँ, जिससे मेरी पत्नी शादी से पहले चुदवा चुकी थी। दिक्कत क्या है यार, मैंने भी तो शादी से पहले बहुत से रांडों की भोंसड़ी मारी है। मेरी बीवी ने मरवा ली तो क्या पहाड़ टूट पड़ा।

एक दिन मैं अपने लैपटाप पर अन्तर्वासना पर कहानी पढ़ रहा था, उस कहानी में एक लड़का अपने चाचा की लड़की से सेक्स करता है। कहानी पढ़ते पढ़ते मुझे अपने बचपन का एक किस्सा याद आ गया, जब एक एक बार मैं और मेरी चचेरी बहन ने, और दो और लोगों से मिल कर कुल चार लोगों ने एक साथ सेक्स किया था। बैठे बैठे सोचा, यार क्यों न अपनी भी कहानी लिखूँ और लोगों से शेयर करूँ।
औरों की कहानियां भी तो पढ़ता हूँ, अपनी कहानी भी पढ़ कर देखूँ, जब अन्तर्वासना पर छप कर आएगी, और लोग उसे पढ़ेंगे, तो कैसा लगेगा। बस यही सोच कर अपना लैपटाप उठाया और लिखने बैठ गया।

लैपटाप में मेरा दफ्तर का काम भी होता है, और हिन्दी में चिट्ठी पत्री टाइप करने के लिए मैंने गूगल इंडिक इनपुट टूल्ज़ का सॉफ्टवेअर इनस्टाल कर रखा है, इससे इंग्लिश को हिन्दी में टाइप करने में बड़ी आसानी रहती है। तो पुरानी यादों का बक्सा खोला और जैसे जैसे जो जो याद आता गया उसे टाईप करता गया। बस जो कहानी मैं लिख पाया, लीजिये आपके सामने है। 

बात तब की है जब मैं 18 को पार कर चुका था और 11वीं क्लास में पढ़ता था, गाँव में देर से पढाई शुरू होती है तो इतनी उम्र हो जाती है. गाजियाबाद के पास हमारा गाँव है, वहीं पर हमारा पुश्तैनी घर है और बाकी का सारा खानदान रहता था।

अब यू पी का लड़का हूँ, तो खून में गर्मी कुछ ज़्यादा ही है। तो 11वीं क्लास में ही लुल्ली उठने लगी थी, बड़ा मन करता था कि कोई गर्लफ्रेंड हो, तो साली को जम कर पेलूँ, मगर स्कूल में जो लड़कियां थी, उनसे तो बात नहीं बन पा रही थी। बड़ा मन भटकता, कभी कभी मुट्ठ भी मार लेता. मगर दिल तो फुद्दी मारने को करता था, मुट्ठ से कहाँ मन को चैन मिल सकता था।
चलो इसी उम्मीद में ज़िंदगी निकल रही थी कि सब्र करो एक न एक दिन तो ज़रूर कोई फुद्दी मिलेगी, जिसे मैं खूब जम कर मरूँगा।

किस्मत ने मुझ पर मेहरबानी की। गर्मियों की छुट्टियाँ हुई तो मैं और मेरी छोटी बहन, मम्मी पापा के साथ हम सब अपने गाँव गए। हालांकि हमारा गाँव कोई हिल स्टेशन तो नहीं था, मगर बचपन में हमें गाँव जाने का बहुत चाव था क्योंकि वहाँ सारा दिन आवारागर्दी करनी, कभी खेत में, कभी ट्यूबवेल पर, कभी ताल पर, कभी बाग में ... बस यूं ही घूमते रहना, कभी गर्मी नहीं लगती थी, कभी बोर नहीं होते थे।

मेरे दो चाचा हैं, उनके बच्चे हमारी ही उम्र के हैं, तो उनसे हमारी खूब पटती थी। हम चारों भाई बहनों ने खूब मस्ती करनी। इस बार भी हमने खूब मस्ती करने की सोची थी।
जब गाँव पहुंचे तो जब मैंने अपनी चाचा की लड़की को देखा, तो एक बार तो मैं भी अचंभित सा हुआ। उसकी कमीज़ सीने से काफी उठी हुई थी।
"अरे यार!" मैंने सोचा- ये तो साली जवान हो गई, बड़ा मम्मा फूला है साली का।

बस दिमाग में ये बात आई और वो जो कुछ पल पहले मेरी बहन थी, अब मुझे वो एक सेक्सी लड़की दिख रही थी। खैर मैंने अपने मन में उठ रहे जवानी की हिलौरें मन में ही संभाली और चुपचाप वक्त का इंतज़ार करने लगा, जब मुझे कोई मौका मिलता और मैं उसकी चढ़ती जवानी को देख सकता, छू सकता या भोग सकता, हालांकि इसकी ऐसी कोई संभावना तो नहीं थी, पर उम्मीद पर दुनिया कायम है, सो मैं भी उम्मीद की कतार में लग गया।

पहले दिन तो कुछह भी खास नहीं था। मगर अगले दिन तक हम सब बिल्कुल घुलमिल गए। अब साल में एक आध बार आते थे गाँव तो साल बाद मिल कर घुलने मिलने थोड़ा सा समय तो लगता ही है।
अगले दिन सुबह उठे और हम दोनों चचेरे भाई पहले खेत में गए। बड़े दिन बाद खुले में शौच किया, तब कोई स्वच्छ भारत जैसी बात नहीं थी, सब खेत में ही जाते थे। हम दोनों भाई काफी देर इधर उधर घूम फिर कर घर वापिस आए। घर आए तो चाय नाश्ता किया, फिर खेलने लगे।

दोपहर के बाद हम सभी चारों भाई बहन घर के पीछे बने बड़े सारे कमरे में बैठे लूडो खेल रहे थे। इस कमरे में घर का पुराना और इस्तेमाल में ना आने वाला समान पड़ा रहता था। इधर कोई आता जाता भी नहीं था। मेरी चचेरी बहन सुमन मेरे बिल्कुल सामने बैठी थी, और मेरी पार्टनर के तौर पर मेरे साथ खेल रही थी। मेरी छोटी बहन मेरे चाचा के लड़के सौरभ की पार्टनर थी।

पहले तो हम सीधे बैठ कर खेल रहे थे, मगर जब खेल काफी चला तो सुमन थोड़ा आगे को झुक कर बैठ गई. और जब वो आगे को झुकी, तो मेरी निगाह उसके कमीज़ के गले के अंदर गई। अंदर दो दूध से गोरे, गोल मम्में दिखे। बस देखते ही मेरा तो मन मचल उठा, मैं सबसे नज़र चुरा कर बार बार उसकी कमीज़ के गले के अंदर देख रहा था। उसके मम्में देख कर मेरा तो लूडो के खेल से मन ही उठ गया। मैं तो अब कोई और ही खेल खेलना चाहता था। मगर चाह कर भी मैं सुमन से वो सब नहीं कह सकता था, जो मेरे मन में था. आखिर मेरी बहन थी, कैसे कहता कि बहना ... मैं तेरे मम्मों से खेलना चाहता हूँ। बेशक मैं सबसे नज़र चुरा कर सुमन के मम्मों को ताड़ रहा था.

मगर सुमन ने मुझे पकड़ लिया और मुझे थोड़ा ताड़ कर बोली- लूडो में ध्यान दो भैया।
बेशक उसकी बात में मुझे ताड़ना थी मगर उसकी आवाज़ में तल्खी नहीं थी, नाराजगी या गुस्सा नहीं था क्योंकि मुझे कहने के बावजूद उसने सीधा होकर बैठने के जहमत नहीं की। मैं फिर भी उसके मम्में ताड़ता रहा, हर बार वो देखती कि मैंने उसकी कमीज़ के गले के अंदर उसके झूल रहे गोरे गोरे मम्में देख रहा हूँ, मगर उसने फिर भी उन्हें छुपाने की कोई कोशिश नहीं की। जिससे मुझे लगा, शायद वो भी यही चाहती है कि मैं उसके मम्में देखूँ।

थोड़ी देर बाद मैंने कहा- यार लूडो में मज़ा नहीं आ रहा, क्यों न कुछ और खेलें।
वैसे भी काफी देर हो गई थी लूडो खेलते, तो मेरे कहने पर सबने छुपन छुपाई खेलने की बात मान ली। बात तो दरअसल यह थी कि मैं सुमन के साथ अकेले में कुछ करने की सोच रहा था और इसके लिए इन दोनों छोटे भाई बहनों को भगाना ज़रूरी था।

खेल खेलते हुये मुझे मौका मिला भी, जब सुमन ऊपर वाले कमरे में जा कर छुपी, तो मैं भी उसके पीछे पीछे भाग कर गया, और उसकी के कमरे में जा छुपा। दरवाजा अंदर से हमने बंद कर लिया। सुमन खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई और नीचे देखने लगी ताकि वो नीचे से आने वाले खिलाड़ी पर नज़र रख सके। मगर मेरी नज़र सिर्फ सुमन पर थी, मैं मन में सोच रहा था 'यार अकेली है, पकड़ ले साली को, जो होगा देखा जाएगा। पकड़ ले साले पकड़ ले।' मेरे मन में बार बार तूफान उठ रहा था।

बस फिर मैं खुद पर काबू नहीं रख पाया और मैंने पीछे से जाकर सुमन को अपनी बांहों में भर लिया। वो थोड़ा चिहुंकी तो, मगर उसने न तो मुझे रोका और न ही कोई शोर मचाया। नई नई जवानी दोनों पर चढ़ी थी, शायद दोनों के दिमाग में एक ही बात चल रही थी। मैंने उसे पीछे से कस कर अपनी बांहों में भरा तो लुल्ली उसकी चूतड़ों की दरार में सेट हो गई। मैंने अपने हाथ थोड़े से ऊपर की और बढ़ाए और उसके दोनों मम्मों पर रखे. अभी मैंने उसके मम्में अपने हाथों में पकड़े नहीं थे कि देखूँ कहीं बुरा तो नहीं मानती।

मगर उसने कुछ नहीं कहा तो मैंने अपने हाथों की पकड़ बढ़ाई और उसके दोनों मम्में अपने दोनों हाथों में पकड़ लिए और दबा कर देखे। दोनों बहुत ही नर्म पर तने हुये से लगे। उसके कड़क मम्में दबाये तो मेरी लुल्ली भी कड़क हो गई और वो पूरी तरह से अकड़ गई। मैं अपनी लुल्ली जो अब काफी हद तक लंड बन चुकी थी, अपनी बहन की गांड पर घिसा कर मज़े ले रहा था, और दोनों हाथों से उसके मम्में भी दबा रहा था।

मम्में मेरे हाथों में और लंड उसकी गांड पर अब तो और आगे बढ़ना चाहिए। यही सोच कर मैंने उसका एक मम्मा छोड़ा और उसका मुंह अपनी तरफ घुमाया। पहली बार हमने एक दूसरे की आँखों में देखा, और फिर मैंने उसके होंठ पर हल्का सा चूमा। ऐसा लगा जैसे हम दोनों को करंट लगा हो। बहुत ही उत्तेजक एहसास हुआ हम दोनों को, मगर इस छोटे से चुंबन में अगर बेहद ऊर्जा थी, तो बेहद मज़ा भी आया।
इसी मज़े ने मुझे दोबारा उसके होंठ चूमने को मजबूर किया। इस बार मैंने उसे अपनी और ही घुमा लिया और मैंने फिर से उसके होंठ चूमे। वो भी शायद जानती थी, होंठ चूमने के बारे में, शायद फिल्मों में देखा होगा. जैसे मैंने उसके होंठ चूसे, उसने भी मेरे होंठों को चूसा।

मैंने अपनी पैन्ट की ज़िप खोल कर अपना लंड बाहर निकाला और उसके हाथ में पकड़ाया। उसने पकड़ तो लिया पर हिलाया नहीं, शायद वो हिलाना नहीं जानती थी। मैंने उसे हिला कर बताया तो वो मेरे बताए अनुसार हिलाने लगी। तन से तन चिपके पड़े थे, होंठ से होंठ जुड़े थे। नई जवानी का पहला प्रेम अपने उत्कर्ष पर था।

मेरा दिल तो कर रहा था कि ये वक्त यहीं रुक जाए। मगर नीचे से दोनों छोटे भाई बहन ने शोर मचाना शुरू कर दिया, उन्हें हम नहीं मिल रहे थे। उनकी आवाज़ सुन कर, सुमन ने अपने होंठ मेरे होंठों से अलग किए। मगर मैंने आगे बढ़ कर फिर से उसके होंटों को चूमा, उसके दोनों मम्में दबाये। उसने भी मेरे लंड को छोड़ दिया और नीचे भाग गई।

उसके बाद तो हम दोनों का एक दूसरे को देखने का नज़रिया ही बदल गया। आते जाते हर वक्त हमारा ध्यान एक दूसरे पर ही रहता। रात के खाने के बाद भी हमें एक दो बार मौका मिला तो मैंने अगर उसके होंठ चूमे, उसके मम्में दबाये तो उसने भी बड़ी उतावली होकर मुझे चूमने दिया, और मेरी लुल्ली को पकड़ा और खींचा। एक दिन में ही हमारा प्यार परवान चढ़ गया था।

कहानी जारी रहेगी.

बावले उतावले-2

अगले दिन सुमन के मामा का परिवार भी आ गया। सुमन के मामा का लड़का भी मेरा ही हमउम्र था। अब हम खेलने वाले 6 लोग हो गए थे। मगर सुमन का ममेरा भाई मोहित बहुत हरामी टाईप था। साले ने बहुत जल्दी भाँप लिया के मेरे और सुमन के बीच कुछ है। शाम को जब हम खेतों की तरफ घूमने गए तो साले ने पूछ भी लिया। अब मेरी भी जाट बुद्धि, मैंने भी उसे सब सच सच बता दिया, तो वो बोला- तो भाई सुमन तो हम दोनों की बहन है, और दूर के रिश्ते में हम दोनों भी भाई ही लगते हैं। तो क्यों न दोनों भाई मिल बाँट कर खाएं।

मुझे क्या इंकार हो सकता था, तो बस उसी रात खेलते खेलते हम तीनों पीछे वाले बड़े कमरे में गए, और बस अंदर जाते ही, सुमन और मैं आपस में लिपट गए, दोनों बेतहाशा एक दूसरे को चूमने लगे। मोहित भी हमारे पास ही खड़ा था। एक लंबा और बढ़िया चुंबन लेने के बाद मैंने सुमन से कहा- मोहित भी हमारे साथ है, वो भी तुमसे प्यार करना चाहता है।
सुमन ने कोई आनाकानी नहीं की। अगले ही पल सुमन और मोहित आपस में लिपटे एक दूसरे को चूम रहे थे। तब मेरे दिल में एक बारगी ये विचार आया कि मैंने मोहित से सुमन की बात करके गलती की। साली अपनी माशूक किसी और के होंठों को चूमे, पहली बार माशूक की बेवफ़ाई का और अपने चूतिया होने का एहसास हुआ।

मगर अब तो गाड़ी चल पड़ी थी, अब कैसे रोका जा सकता था। मोहित ने सुमन को खूब चूमा, उसके मम्में मसले, साले ने अपनी पैन्ट की ज़िप खोल कर अपना लंड निकाल कर सुमन को पकड़ाया, तो अपना एक हाथ उसने भी सुमन की सलवार में डाल दिया। अब पता नहीं सलवार में हाथ डाल कर वो क्या कर रहा था, सुमन तो उसके होंटों को खा जाने को हो रही थी, और उसके मुंह से बस- उम्म ... आह ..." ही निकल रही थी।

मैंने जब ये उत्तेजक कामुक दृश्य देखा, तो मुझसे भी न रहा गया। मैंने अपनी पैन्ट की ज़िप खोली और अपना लंड निकाला और सुमन के पीछे जाकर चिपक गया। मोहित ने सुमन की सलवार खोल दी, उसकी सलवार नीचे गिरा कर मोहित ने अपना लंड सुमन के आगे लगाया और मैंने पीछे लगा दिया मगर अंदर किसी ने नहीं डाला।
हम दोनों बारी बारी से सुमन के होंठ चूम रहे थे, और वो भी हम दोनों से मज़े ले रही थी।

फिर मोहित बोला- यार ऐसे मज़ा नहीं आता, सुमन, मुझे तेरी फुद्दी मारनी है, कल दोपहर को खेतों में चलते हैं, वहाँ जा कर सब कुछ करेंगे।
सुमन ने हाँ बोला, मैं भी खुश हो गया कि चलो मोहित के बहाने से ही सही, साला फुद्दी का जुगाड़ तो हो गया।

अगले दिन हम घर में घूमने का कह कर खेतों की ओर चले गए। हमारे खेतों से आगे काफी आगे जाकर थोड़ी बेकार सी ज़मीन है, जहां पर सिर्फ कीकर, करीर जैसे बेकार से पेड़ और झाड़ उगे हैं। हम तीनों वहाँ जा पहुंचे, और उन झाड़ों में काफी अंदर तक चले गए। आगे थोड़ी सी साफ जगह मिल गई, तो हम तीनों वहाँ जा बैठे। अब एक धुकधुकी हम तीनों के दिल में थी, आ तो गए, अब चोदाचादी शुरू कैसे करें।

ये काम भी मोहित ने ही शुरू किया। उसने सुमन का मुंह अपनी तरफ घुमाया और उसको चूम लिया। बस इसी एक शुरुआत की ज़रूरत थी, फिर तो मैं भी सुमन से चिपक गया। दोनों, मैं और मोहित, कभी एक उसका मुंह अपनी तरह घूमा कर उसके होंठ चूसता, तो कभी दूसरा, सुमन के तो दोनों हाथों में लड्डू थे। और हमारे हाथों में सुमन के मम्में थे।

मोहित ने सुमन की कमीज़ ऊपर उठा दी। नीचे से उसने ब्रा या अंडरशर्ट कुछ भी नहीं पहना था। गोरे गोल मम्मे, जिन पर हल्के गुलाबी से रंग के निप्पल बन कर उभर रहे थे। पहले मैंने सुमन के मम्में को दबा कर देखा, मगर मोहित तो सीधा चूसने ही लगा। फिर मैंने भी सुमन का मम्मा चूसा। मोहित और मैंने दोनों ने अपनी अपनी पैन्ट उतार दी, और चड्डी भी उतार कर हम दोनों तो नंगे ही हो गए। दोनों की झांट आ गई थी। शायद वो भी कभी कभी मुट्ठ मारता होगा, मेरी तरह उसके भी लंड की सील टूटी हुई थी।

हम दोनों ने अपने अपने लंड सुमन को पकड़ाये। सुमन हम दोनों के लंड पकड़ कर दबाने लगी। फिर मोहित ने सुमन की सलवार का नाड़ा खोला, एक बार तो सुमन ने रोका, वो थोड़ा शरमाई भी। मगर मोहित तो बहुत ही उतावला हो रखा था। उसने नाड़ा खोला और एक ही बार में सुमन की सलवार खींच कर उतार दी, और उसके बाद उसकी कमीज़ भी उतार दी।

सुमन हम दोनों के बीचे बिल्कुल नंगी हो कर लेटी थी। वो नंगी हुई तो हम दोनों ने अपनी अपनी कमीज़ उतार दी।
मोहित ने मुझसे पूछा- पहले तू करेगा या मैं करूँ?
मैंने कहा- पहले मेरी दोस्ती हुई थी सुमन से, मैं ही करूंगा।
मोहित एक बगल हट गया, बोला- चल आजा फिर।

मैं सुमन की दोनों टांगों के बीच में आया, मैंने अपना लंड उसकी फुद्दी पर रखा और अंदर डालने की कोशिश करी मगर मेरा लंड सुमन की फुद्दी में नहीं घुसा।
मोहित बोला- अबे चल बे भोसड़ी के, तुझे तो पता भी नहीं के कहाँ डालते हैं। हट पीछे मैं दिखाता हूँ।
मोहित मुझे परे धकियाते हुये खुद मेरी जगह आया और उसने सुमन की दोनों टांगें अपने हाथों से पकड़ कर पूरी खोल दी और अपनी कमर हिला कर ही अपना लंड उसकी फुद्दी पर सेट किया। तब मैंने देखा कि मैं तो ऊपर ही अपना लंड सेट कर रहा था, वहाँ कहाँ घुस पाता मेरा लंड।

और जब मोहित ने रख कर अंदर को घुसेड़ा तो उसके लंड के टोपा एक मिनट में सुमन की फुद्दी में घुस गया मगर साथ ही सुमन भी तड़प उठी- हाय ... मोहित भैया।
उसने मोहित की कमर पकड़ कर उसे रोकने की कोशिश करी। सुमन का चेहरा दर्द से भरा था। मगर मोहित पर उन्माद छाया था। उसने सुमन की कोई बात नहीं सुनी और अपना लंड और उसकी फुद्दी में घुसेड़ा। सुमन रोई तो नहीं, मगर उसे दर्द ज़रूर हुआ था, पर वो सब सह गई।
मैंने देखा थोड़ा थोड़ा करके और सुमन को "बस थोड़ा सा और, थोड़ा सा और" कहते कहते मोहित ने अपना सारा लंड उसकी फुद्दी में घुसेड़ दिया।

माशूक मेरी, सेट मैंने की, मगर चुदाई पहले उसने की। पूरा लंड अंदर डालने के बाद मोहित ने कई बार अपनी कमर आगे पीछे करी। कुछ देर तक मोहित ने सुमन को बड़े प्यार से चोदा और फिर मुझको बोला- चल तू भी डाल के देख।
उसने अपना लंड बाहर निकाला और मैं फिर से सुमन की टांगों के बीच में था। मैं सुमन के ऊपर झुका तो उसने मेरा लंड पकड़ कर खुद ही अपनी फुद्दी पर सेट किया। मैंने हल्का सा धक्का लगाया और मेरा लंड अंदर को घुस गया। जैसे कोई गरम गीली गुफा हो। सच में बड़ा मज़ा आया, पहली बार फुद्दी में मेरा लंड घुसा था।

ये बात तब मेरे दिमाग में नहीं आई कि सुमन की सील तोड़ने का मज़ा मैं नहीं ले पाया, पर आज ये बात ज़रूर सोचता हूँ। मैं भी मोहित की देखा देखी अपना लंड सुमन की फुद्दी में डाला और आगे पीछे करने लगा। बेशक मुझे नहीं पता मैं सुमन को सही से चोद रहा था या नहीं, मगर सुमन ने जब मेरे साथ किया तो उसने कहा ज़रूर- तू मोहित से बढ़िया कर रहा है।
मैं तो फूल कर कुप्पा हो गया और खुद को बहुत बड़ा चोदू समझने लगा। मैंने एक काम और किया जो, मोहित ने नहीं किया था, वो ये के मैंने अपना पूरा लंड सुमन की फुद्दी के अंदर तक डाला, जबकि मोहित सिर्फ अपना आधा लंड ही उसकी फुद्दी के अंदर बाहर कर रहा था, शायद इसी से सुमन को चुदवाने में ज़्यादा मज़ा आया और उसने मुझे मोहित से बढ़िया पाया।

चुदाई के दौरान हमने सुमन के खूब मम्में चूसे, खूब दबा दबा कर देखे, पहली बार जो किसी लड़की के साथ सेक्स जो कर रहे थे। मोहित ने सुमन को अपना लंड चूसने को कहा, मगर सुमन ने साफ मना कर दिया- ये गंदे काम न तू अपने शहर की रंडियों से करना, मैं ऐसा घटिया काम कतई न करूँ।
जब मोहित ने थोड़ा और ज़ोर डाला तो सुमन तो बिगड़ गई- अबे जब एक बार मना कर दिया तो पल्ले न पड़ता तेरे। साले जो काम ढंग से करना है तो कर, नहीं तो भाग जा भोंसड़ी के।

सुमन के मुंह से गाली सुन कर तो हम दोनों के गोटे हलक में आ गए। हमें नहीं पता था कि सुमन इतनी बिगड़ैल, इतनी बिंदास है।

खैर मैं अपनी स्पीड से लगा रहा। थोड़ी देर बार मेरा माल छूटा, साली इतनी समझ ही नहीं थी कि माल बाहर गिराते हैं। मैंने तो सुमन की फुद्दी में ही अपना सारा माल गिरा दिया। मैं जैसे ही फारिग हो कर सुमन के ऊपर से उतरा, तभी मोहित मेरी जगह आ गया, और उसने अपना लंड सुमन की फुद्दी में डाल दिया, उसने मुझे पूरा लंड डाल कर चुदाई करते हुये देख लिया था, तो वो भी पूरा लंड डाल कर सुमन को चोदने लगा।

यह वो वक़्त था, जब हमें इस बात का कोई एहसास ही नहीं था कि सही सेक्स क्या होता है। इसमें सिर्फ अपनी नहीं, अपने साथी की संतुष्टि का भी खयाल रखना पड़ता है।

कुछ देर बाद मोहित ने भी अपना सारा माल सुमन की फुद्दी में झाड़ दिया। हमें बड़ा मज़ा आया। मगर यह मज़ा ऐसा था कि इससे हमारा दिल ही नहीं भरा। कपड़े पहनते पहनते हमने कल का प्रोग्राम भी फिक्स कर लिया कि कल बाद दोपहर फिर इसी जगह मिलेंगे और फिर से मज़े करेंगे।

उसके बाद तो हमारा ये रोज़ का ही प्रोग्राम होने लगा। सुमन भी हर वक्त गरम रहती, बावली रहती चुदाई के लिए। और हम दोनों भी उतावले रहते. मैं और मोहित दोनों को बस हर जगह सुमन ही दिखती। आते जाते हम दोनों सिर्फ उसको ही घूरते रहते। उसके मम्मे, उसकी गांड। उसका हँसना, बोलना, बात करना, चलना, चहकना। बस हम दोनों तो उसी को देख देख कर दीवाने हो रखे थे।

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